Glaucoma / ग्लौकोमा
The world is coming together on March 13 to reinforce awareness and understanding about the importance of early detection of glaucoma, the world’s second leading cause of blindness, and the Antardrishti to Prevent Blindness is supporting this initiative.

Glaucoma is a worldwide epidemiological challenge affecting approximately four percent of the global population with an estimated 50 percent of glaucoma cases remaining undiagnosed. Research shows that in 2010, an estimated 60.5 million people globally will be living with either angle closure glaucoma or primary open angle glaucoma. World Glaucoma Day offers an opportunity to educate patients with glaucoma and those at risk for the disease by raising awareness and providing helpful tips about the importance of early diagnosis and appropriate treatment.
ग्लौकोमा आंख का एक ऐसा रोग है जिससे दृष्टि की हानि या अन्धता हो सकती है. ग्लौकोमा होने पर आंख में द्रव की मात्र बढ़ जाती है जिससे आंख के पिछले हिस्से पर दबाव पड़ता है. यह दबाव दृष्टि तंत्रिका को नुकसान पहुंचाता है. जो दृष्टिहीनता का कारन बनता है. अधिक जानकारी के लिए पोस्टर डाउनलोड करे.
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The world is coming together on March 13 to reinforce awareness and understanding about the importance of early detection of glaucoma, the world’s second leading cause of blindness, and the Antardrishti to Prevent Blindness is supporting this initiative.

Glaucoma is a worldwide epidemiological challenge affecting approximately four percent of the global population with an estimated 50 percent of glaucoma cases remaining undiagnosed. Research shows that in 2010, an estimated 60.5 million people globally will be living with either angle closure glaucoma or primary open angle glaucoma. World Glaucoma Day offers an opportunity to educate patients with glaucoma and those at risk for the disease by raising awareness and providing helpful tips about the importance of early diagnosis and appropriate treatment.
ग्लौकोमा आंख का एक ऐसा रोग है जिससे दृष्टि की हानि या अन्धता हो सकती है. ग्लौकोमा होने पर आंख में द्रव की मात्र बढ़ जाती है जिससे आंख के पिछले हिस्से पर दबाव पड़ता है. यह दबाव दृष्टि तंत्रिका को नुकसान पहुंचाता है. जो दृष्टिहीनता का कारन बनता है. अधिक जानकारी के लिए पोस्टर डाउनलोड करे.
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Download Glaucoma Poster Hindi Antardrishti Launches a forum for the friends of blind![]() Antardrishti, launched “antardrishti forum for friends of blind” on Sunday at the Youth Hostel, Agra. Two small children, Chunmun and Khushendra, both aged four years launched the forum by planting a tree at youth hostel. Both of them are blind from birth and learning Braille with the assistance of the Antardrishti. click here to see more photo आगरा । आज दिनांक 21 फरवरी 2010 को 3 बजकर 30 मिनट पर ''अन्तरदृष्टि फोरम फॉर फ्रेंण्डस ऑफ ब्लाइंड '' (Antardrishti Forum for Friends of Blind) की शुरूआत 4 वषीर्य दृष्टिहीनों बच्चों चुनमुन और खुशेन्द्र द्वारा पौधारोपड़ करके की गई। दोनों के परीवारी जनों के अलावा मुकेश जैन, डा अमर प्रकाश, श्रीधर उपाध्याय, शिल्पी, शिप्पी, आलोक कुलक्षेष्ठ ने पौधारोपड्र की प्रक्रियां में सहयोग किया । कार्यक्रम की शुरूआत दृष्ठिहीन बालिका मनीषा के गायन और सभागार मे उपस्थितजन के स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात ''अन्तरदृष्टि फोरम फॉर फ्रेंण्डस ऑफ ब्लाइंड '' के गठन की पृष्ठभूमि को पढ़ कर सुनाने के साथ्ा ही पौधारोपड़ कर फोरम की शुरूआत की। इस अवसर पर वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़े बिना उनकों स्वावलम्बी नहीं बनाया जा सकता । दृष्टिहीनों को दया/दान की जरूरत नहीं है, उन्हें तो बस समान अवसर व कौशल की जरूरत है। सरकारी क्षेत्रों में तो आरक्षण की वजह से नौकरी मिल जाती है लेकिन निजी क्षेत्रों में दृष्टिहीनों के लिए रोजगार के अवसर न के बराबर है । जरूरत इस बात की है कि निजी क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसरों की संभावनाओं को तलाशा जाना चाहिए और जरूरत पढ़ने पर उपयुक्त प्रशिक्षण का भी इंतजाम होना चाहिए। दृष्टिहीनों के परीवारी जन, मित्रों, और हितेषीयों को एक मंच पे लाकर दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से गठित फोरम की शुरूआत पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने यह उम्मीद की समाज के विभिन्न तबके के लोग भी इस मंच से न सिर्फ जुड़ेगें बल्कि भरपूर सहयोग भी देगें। कार्यक्रम के अंत में सभागार में उपस्थित जन से अपील की गई कि वह इस फोरम के सदस्य बनें और साथ ही साथ नेत्रदान का भी संकल्प ले ताकि काफी संख्या में दृष्टिहीनों की दृष्टि वापास आ सकें। लगभग 40 लोगों ने नेत्रदान का संकल्प लिया तथा यह उम्मीद की और भी लोग इस कार्य से जुड़ेगें। वक्ताओं में मुख्य रूप से श्रीधर उपाध्याय, जयकरन, शिल्पी, शिप्पी, मनोहर लाल गिदवानी, डा. अंनत बाजपेयी, मनीष, नरेन्द्र कुमार बघेल, ब्रजेश, डा. खिम्मनजी, भावना त्रिपाठी ने अपने विचार रखें। कार्यक्रम का संचालन रमेश शर्मा ने किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से डा. पुष्पा श्रीवास्तव, डा. बचन सिंह सिकरवार, मंजू उपाध्याय, अजय, रफीक, उषा श्रीवास्तव, शिवशंकर, गया प्रसाद अनुरागी, रघुनाथ, रामधनुष, पन्नीराम, अमरीषपुरी आदि का सहयोग सराहनीय रहा। |
''Antardrishti Forum for Friends of Blind '' का गठन होगाआगरा। आज दिनांक 7 फरवरी 2010 को अपरहान 3.30 पर अंतरदृष्टि द्वारा दृष्टिहीनों की समस्यओं और उनके समाधान पर एक परिचर्चा का आयोजन दिल्ली गेट स्थित गोवर्धन होटल में किया गया। श्री श्रीधर उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने परिचर्चा के उद्देश्यों को बताते हुए कार्यक्रम की शुरूआत की। सहभागियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि आगरा जैसे विकसित शहर में दृष्टिहीनों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। समाज या तो उन्हें दया का पात्र मानता है या फिर किसी काम का नहीं। पढ़ाई लिखाई हो जाने के बाद भी रोजगार के साधन लगभग न के बराबर है। जानकारी और संसाधनों तक पहुंच न होने के कारण भी दृष्टिहीनों के एक बड़े तबके को विभिन्न सरकारी - गैरसरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है, ऐसी स्थिति में किस तरह से बदलाव लाया जा सकता है को जानने के उद्देश्य से ही इस बैठक का आयोजन किया गया है। ![]() परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए अखिल श्रीवास्तव ने कहा कि दृष्टिहीनों की वर्तमान स्थिति पर यदि एक नजर डाली जाये तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि आजादी के 60 वर्षो के बाद भी दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में हम असफल रहें हैं। 30 प्रतिशत से भी ज्यादा दृष्टिहीन शहरी क्षेत्र में रहते है। यदि दृष्टिहीन विद्यालयों मे रहने वाले दृष्टिहीनों को छोड़ दिया जाये तो शायद ही आपको कभी कोई दृष्टिहीन सड़क पर चलते हुए या किसी सामाजिक गतिविधि में भाग लेते हुए मिले। कभी देखा है आपने इन्हें स्कूल, कालेज, बैंक, पोस्ट-ऑफिस या किसी अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए। क्या कारण है कि ये लोग शहर में रहते हैं, फिर भी दिखाई नहीं दे। ऐसा लगता है मानों किसी ने इनको समाज से काट कर अलग-थलग कर दिया हो। आज भी दृष्टिहीनों को समाज में दया या घृणा का पात्र माना जाता है। दृष्टिहीनों को एक अशक्त वर्ग समझ कर दया और दान का पात्र समझा गया है। लेकिन सत्य यह है कि दृष्टिहीनों की आकांक्षाओं को न तो समाज ने और न ही सरकार ने सही रूप में समझा है। जहां समाज ने उन पर दया उड़ेंली है वही सरकारों ने उन्हें कुछ कामों तक ही सीमित कर दिया। हमारे लिए दृष्टिहीन न तो उपेक्षा के पात्र है और न दया किये जाने वाले 'बेचारे'। शरीर के दूसरे किसी भी रोग की तरह दृष्टिहीनता भी एक रोग है जिसके रोगी को उपेक्षा, घृणा और दया के बजाय सहयोग और बराबरी का भाव पैदा करने की जरूरत होती है। उन्होंने आगे कहा कि अंतरदृष्टि की यह स्पष्ट अवधारणा है कि दृष्टिहीनों के प्रति समाज को जागरूक बनाने के साथ ही साथ दृष्टिहीनों को समान अवसर और कौशल दिलाकर तथा उत्पादन की प्रक्रियाओं या उनके सक्रिय योगदान के लिए स्थान उपलब्ध कराके ही इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। साथ ही साथ यह भी जरूरी है कि समाज का वह तबका जो कि किसी न किसी रूप से दृष्टिहीनों के जीवन को प्रभावित करता है इनकी मौजूदगी को न सिर्फ स्वीकार करे बल्कि इनके साथ सम्मान व बराबरी का बर्ताव भी करें। विगत 6 वर्षो से जारी अपने हस्तक्षेपों से प्राप्त अनुभवों का गहन विश्लेषण करने के बाद हमने एक ऐसे मंच की जरूरत महसूस की जहां पर दृष्टिहीनों के साथ - साथ उनके परीवारी जन, मित्र, व विभिन्न समुदाय के लोग आपस में विचार-विमर्श, अनुभवों का आदान-प्रदान व एक दूसरे को सहयोग के द्वारा दृष्टिहीनों की समस्याओं का न सिर्फ समाधान कर सके, बल्कि दृष्टिहीनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ सकें। आगरा विश्वविद्यालय में कुर्सी बुनकर के पद पर कार्यरत रघुनाथ जी (दृष्टिहीन) ने भी आखिल श्रीवास्तव द्वारा कही गई बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वह भी पिछले कई सालो से इस तरह के एक मंच की कमी महसूस कर रहे थे, लेकिन सहयोग न मिल पाने के कारण्ा मंच का गठन नहीं कर पाये। परिचर्चा में उपस्थित सभी लोग इस बात से सहमत थे कि इस तरह के एक मंच की जरूरत है जो न सिर्फ उनकी समस्याओं का समाधान करने में उनकी मदद करे बल्कि उनको समाज में सम्मान और बराबरी का दर्जा दिला सके। मनोहर लाल गिदवानी ने इस बात पर खुशी जताते हुए कहा कि यह एक अच्छा कांसेप्ट होगा और इसकी जरूरत भी है, क्योंकि समाज में आज भी दृष्टिहीनों को दया का पात्र माना जाता है, यह फोरम समाज को इस बात के लिए जागरूक करने में सहायक होगा कि दृष्टिहीन दया के पात्र नहीं है बल्कि उनको सही प्रशिक्षण और मौंकों की जरूरत है ताकि वो भी आत्मनिर्भर हो सकें। मंजू उपाध्याय (दृष्टिहीन) ने भी मंच बनाने की जरूरत पर बल दिया और कहां कि अभी तक आगरा में दृष्टिहीन लड़कियों के लिए किसी भी तरह की कोई सुविधा नहीं थी लेकिन अंतरदृष्टि द्वारा किये जा रहे प्रयासों से अब यहां की लड़कियां भी पढा़ई कर सकेंगी और इस मंच के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान कर सकेगीं। सिप्पी (दृष्टिहीन बालिका) ने इस बात पे खुशी जताई कि आज वो पहली बार अपने जैसे कई सारे दृष्टिहीनों के साथ बैठ के बात कर रही है और मंच के बनने की प्रक्रिया में वो भी शामिल है। उसके पिता श्री ब्रजेश जी ने कहां कि वो आगरा में पिछले 4 साल से रह रहे है लेकिन पहली बार उनहें किसी ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने का मौका मिला है जहां पर दृष्टिहीनों की भलाई के लिए बातचीत हो रहीं है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आज उन्हें बहुत खुशी है कि उनकी बेटी को आगे बढ़ाने में वो अकेले नहीं है, पूरा समाज उनके साथ है। इसके बाद मंच का नाम क्या हो इस पर चर्चा शुरू हुई और अखिल श्रीवास्तव ने एक नाम ''अन्तरदृष्टि फोरम फॉर फ्रेंण्डस ऑफ ब्लाइंड '' (Antardrishti Forum for Friends of Blind) सुझाया, जिसका परिचर्चा में उपस्थित सभी लोगों ने स्वागत करते हुए कहां कि यही ठीक रहेगा। तत्तपश्चात फोरम का गठन कैसे हो, किन लोगो को इसमे शामिल किया जाये, कैसे काम करेगा आदि महत्वपूर्ण बातो पर यह तय किया गया कि जैसे - जैसे फोरम की गतिविधियां आगे बढ़ेगी इन प्रश्नों का भी जवाब मिलता जायेगा। इस बात पर सभी लोग एक मत थे कि फोरम में दृष्टिहीन और दृष्टि वाले दोनो ही तरह के लोगों को शामिल किया जायेगा और शुरूआत में फोरम का संचालन करने हेतु 9 लोगों की एक टीम बनाई जाये जिसमें 5 दृष्टिहीन और 4 सामान्य व्यक्तियों को शामिल किया जाये। जयकरन (दृष्टिहीन) ने यह सुझाव रखा कि मंच में शामिल होने वाले सदस्यओं से कुछ न कुछ फीस अवश्य ली जाये, साथ में उन्होंने यह भी कहा कि जो सदस्य अपने पैरो पर खड़े हो चुके है उनहें यह जिम्मेदारी ज्यादा मजबूती से लेनी चाहिए ताकि दृष्टिहीनों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। अम्बरीषपुरी (दृष्टिहीन) ने जयकरन की बातो से सहमती जताते हुए कहा कि किसी भी संगठन को चलाने के लिए पैसो की जरूरत होती है और हम लोगों को चाहिए कि स्वयं ही पैसों का इंतजाम करें बजाय इसके कि दूसरों से भीख मांगी जाये। उन्होंने यह भी कहां कि हम दृष्टिहीनों को दया और दान नहीं चाहिएं हमें चाहिए सही प्रशिक्षण और भेदभाव रहित समाज ताकि हम लोग भी आत्मनिर्भर हो सकें। बातचीत के दौरान निम्न मुख्य उद्देश्य सामने आये -
आगामी 21 फरवरी 2010 को एक बड़ी बैठक बुला कर उसमें फोरम के गठन की घोषणा करने और विधिवत रूप से शुरू करने पर सहमति बनी और अंत में श्रीधर उपाध्याय ने सभी सहभागियों को धन्यवाद दिया। |
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